हार्ड डिस्क के बारे में हम सभी ने सुना है ,जैसे किताबों को संजो कर रखने के लिए लाईब्रेरी की आवश्यकता होती है उसी प्रकार कंप्यूटर में डिजिल डेटा को को रखने के लिए हार्ड डिस्क की ज़रूरत होती है। हार्ड डिस्क को सुपर डिस्क या हार्ड डिस्क ड्राइव भी कहते है।
यह एक प्रकार का डिवाइस है जिसमें फोटोज़, ज़रूरी डॉक्यूमेंट, चलचित्र, सॉफ्टवेयर को इकट्ठा करकर रखा जाता है।इसे मैग्नेटिक चीजों से बनाया गया है और यह हमारे सभी जरूरी डेटा को संग्रहित करकर रखता है। आजकल कोई भी कंप्यूटर बिना हार्ड डिस्क के काम नहीं करेगा। इसकी स्टोर करने की तकनीक लगभग ४ टेराबाइट तक पहुंच गई है। हार्ड डिस्क में डेटा स्थायी रूप से संग्रहित रहता है।
डिलीट हुआ डाटा कैसे प्राप्त करें – Hard Disk Data Recovery Kaise Kare
सर्वप्रथ्म हार्ड डिस्क आई.बी.एम कंपनी ने बनाई थी जो सिर्फ ५ एम.बी यानी कम डेटा स्टोर कर सकता था, फिर इसी में बदलाव होते हए अब हार्ड डिस्क की स्टोरेज क्षमता को बढ़ा दिया गया है। हार्ड डिस्क एक प्रकार का ‘नॉन वोलाटाइल मैमोरी हार्डवेयर डिवाइस है’ यानी इसमे रखा हुआ डेटा कंप्यूटर बैंड होने पर भी कभी डिलीट नही होगा, वह स्थाई रहता है।
हार्ड डिस्क के पहले कंप्यूटर में डेटा फ्लॉपी में रखा जाता था, परंतु इसकी स्टोरेज कम थी अतः इसमे कम डेटा आता था, जिससे कार्य मे विघ्न आते थे। हार्ड डिस्क के कई प्रकार भी है-
- पा.टा, (पैरेलल एडवांस टेक्नोलॉजी अटैचमेंट) – यह सबसे पुरानी और मध्यम गति की हार्ड डिस्क है। इसका डेटा ट्रांसफर का रेट भी कम है। यह ड्राइव मैग्नेटिसम द्वारा डेटा ट्रांसफर करती है।
- सा.टा (सीरियल एडवांस टेक्नोलॉजी अटैचमेंट)- यह आजकल कंप्यूटर में लगाया जाता है। पा.टा के मुकाबले इसका डेटा ट्रांसफर रेट भी ज़्यादा है। सा.टा के केबल पतले और अच्छे होते है।
- एस.सी.एस.आई (स्माल कंप्यूटर सिसिटेम इंटरफ़ेस)- इस प्रकार का हार्ड डिस्क कंप्यूटर से जुड़ने के लिए इंटरफ़ेस का इस्तेमाल करते है। इसकी डेटा ट्रांसफर स्पीड भी अधिक है।
- एस.एस.डी ( सॉलिड स्टेट ड्राइव)- यह सबसे आधुनिक ड्राइव है। यह डेटा स्टोर करने के लिए फ़्लैश मेमोरी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करती है।यह महँगा भी आता है।
हार्ड डिस्क के अंदर एक गोल डिस्क या यंत्र होता है जिसे प्लैटर कहते है, इसमे डेटा स्टोर होता है। इस गोल यंत्र में एक पतली पट्टी होती है जो चुम्बकीय चीज़ों से बनी होती है। इसी प्लैटर में कई सारे ट्रैक और सेक्टर होते है जो घूमते है और हार्ड डिस्क में लगा डेटा रीड,राईट आर्म उसके ऊपर खिसकता है, इसका काम डेटा पढ़ना और लिखना होता है।
हार्ड डिस्क में डेटा छोटे चुम्बकीय क्षेत्रों में संग्रह किया जाता है जो प्लैटर पे होते है और हर क्षेत्र को ‘बिट’ कहते है। हार्ड डिस्क में डेटा शून्य और एक के रूप में स्टोर होता है। हार्ड डिस्क में डेटा लिखने के लिये चुम्बकीय क्षेत्र को, प्लैटर के चुम्बकीय क्षेत्र पर इनमे से किन्ही दो वृत्तियों में रखा जाता है-
- नॉर्थ-साउथ: अगर नॉर्थ पोल साउथ पोल के पहले आये
- साउथ-नॉर्थ: जिसमे साउथ पोल नॉर्थ पोल के पहले आये
साउथ- नार्थ दिशा का उन्मुखीकरण शून्य को दर्शाता है और
नॉर्थ- साउथ दिशा में उन्मुखीकरण एक को दर्शाता है । इन वृत्तयों को मापने के लिए हार्ड डिस्क के अंदर कंट्रोलर बने होते है। जितनी तेजी से यह डिस्क घूमती है जिसकी गति को हम रेवोल्यूशन पर मिनेट के हिसाब से मापते है। हार्ड डिस्क में जितना ज़्यादा रेवोल्यूशन पर मिनेट होगा उतने ही अच्छे तरीके से डेटा हार्ड डिस्क में स्टोर किया जा सकता है।
ज़्यादा तर हार्ड डिस्क ५४००- ७२०० आर. एम.पी की होती है। हार्ड डिस्क को सेकंडरी स्टोरेज डिवाइस भी कहते है, यह लैपटॉप या कंप्यूटर के भीतर होता है और कंप्यूटर से डेटा केबल ( पा.टा , सा. टा) के उपयोग से जुड़े रहते है। हार्ड डिस्क जानकारियों को संग्रहित करने के लिए चुम्बकीय स्टोरेज का उपयोग करता है।
एक हार्ड डिस्क की स्टोरेज क्षमता बहुत अधिक होती है। यह बाजार में सस्ते दाम में भी मिल जाएगा और यह काफी ज़रूरी चीज़ों को लंबे समय तक संग्रह करके रखने के लिए काम आता है।
